• न्यूज की न्यूज डेस्क.

करगिल विजय दिवस स्पेशल : ऐसा परिवार जिसने वर्ल्ड वार से लेकर कारगिल तक के युद्ध लड़े और अब नई पीढ़ी से

आज करगिल विजय दिवस है। 1999 में हुए इस युद्ध में शहीद हुए जवानों के शौर्य की मिसालें दी जाती हैं। युद्ध में फतह करने वाले जवानों से प्रेरित होकर अब किसी जवान का बेटा, किसी का भतीजा सेना में भर्ती हुआ है। रोहतक के सुंदरपुर निवासी लांसनायक विजय सिंह जब शहीद हुए, तब बेटा जोगेंद्र 2 साल का था। मां सतवंती से पिता के शौर्य की कहानियां सुन बेटा उनकी ही रेजीमेंट में तैनात हुआ। वहीं, रोहतक के एक परिवार की लगातार चौथी पीढ़ी सेना में गई है। अब तक परिवार के 8 लोग सेना में जा चुके हैं।

करगिल युद्ध में शहीद हुए जाट रेजीमेंट के लांसनायक विजय सिंह की पत्नी सतवंती देवी बताती हैं, ‘पति की शहादत के समय बड़ा बेटा जोगेंद्र 2 साल का था। पति ने पहले ही वादा किया हुआ था कि बेटे को भी सेना में भेजना है। पति के वादे को हर पल बेटे को बताती थी। इसी से प्रेरित हो बेटे ने सेना में जाने के लिए मेहनत की। 2017 में जोगेंद्र भी जाट रेजीमेंट में बतौर सिपाही तैनाती मिली। पोस्टिंग 6 माह पहले ही अलवर में हुई है।’ विजय के छोटे भाई विजेंद्र बताते हैं, ‘ऑपरेशन विजय में लांसनायक कृष्णलाल, हवलदार बलवान सिंह लापता हो गए थे। टाइगर हिल की पोस्ट पर तैनात विजय को 3 जुलाई को संदेश मिला कि वह टुकड़ी के साथ इनकी खोज करें। टुकड़ी आगे बढ़ी तो पाक की ओर से आया मोर्टार का एक गोला सीधे विजय की छाती में लगा। वे मौके पर शहीद हो गए। मेरे बेटे सतेंद्र का जन्म भाई की शहादत के बाद 1 नवंबर 2000 को हुआ। वह अपने ताऊ की शाैर्य गाथा से प्रेरित होकर 53 आर्म्ड फोर्स में भर्ती हुआ। 29 जुलाई को लद्दाख में पोस्टिंग मिलने जा रही है।

परिवार की चौथी पीढ़ी सेना में, वर्ल्ड वाॅर से करगिल तक लड़े, पिता-पुत्र अब भी सेवा में

रोहतक के खरावड़ के रहने वाले जाट रेजीमेंट के रिटायर्ड कैप्टन प्रताप सिंह बताते हैं, ‘3-4 जून की रात करगिल में पहाड़ी पर मोर्चा लगाए बैठे थे। अचानक दुश्मन की ओर से गोला फेंका गया। उसका एक टुकड़ा सिर में आकर धंस गया। मैं बेहोश हो गया। मुझे श्रीनगर अस्पताल में भर्ती कराया गया। 3 दिन हालत में सुधार नहीं हुआ तो दिल्ली में बेस हाॅस्पिटल लाया गया। यहां भी डॉक्टरों ने जवाब दे दिया। अगले दिन आरआर हॉस्पिटल दिल्ली रेफर कर दिया। न्यूरो सर्जन ने 3 दिन बाद हालत को स्थिर देखते हुए सिर का ऑपरेशन किया। गोले के टुकड़ों काे सिर से निकालने के बाद हालत में सुधार हुआ। 3 माह बाद डिस्चार्ज किया गया। शरीर का बायां हिस्सा एक साल तक पैरालाइज रहा। आज भी कम सुनाई देता है। जब मैं घायल हुआ, तब भतीजा संदीप 11 साल का था। मेरे पास बैठकर युद्ध के किस्सों को गौर से सुनता था। तभी उसने फैसला किया कि एक दिन सेना में जाएगा। उसे कोचिंग दिलवाई और सेना के लिए शारीरिक रूप से तैयार किया। संदीप जुलाई 2009 में नौसेना में भर्ती हो गया। अब पेटी ऑफिसर के तौर पर मुंबई में तैनात है।’ खरावड़ के इस परिवार की लगातार 4 पीढ़ियां सेना में रहकर देशसेवा करती आ रही हैं। पहली बार हवलदार चौ. कूरेराम सेना में रहे। अब भी परिवार से दो लोग सेना में हैं।

6 views

Subscribe to Our Newsletter

  • White Facebook Icon

Haryana, India

© 2023 by TheHours. Proudly created with Wix.com